MUSKURA KE TO JAAIYE

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

निज मन तू पहचाने बन्दे पूत आत्मा तेरी


निज मन तू पहचाने बन्दे 
पूत आत्मा तेरी 
निश्छल गंगा से बहने दे 
कभी न होए मैली !!
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सोना चांदी लाद -लाद तन 
मन पर बोझ बढ़ाये 
ममता प्यार सत्य अनुशासन 
नियम -नीति भूला जाए !!
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बही दिखावा गठरी सारी 
अहम बड़प्पन सारे 
छीन झपट घर महल सजाना 
व्यर्थ -काम ना आते !!
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दान मान मर्यादा -धीरज 
संयम दया प्रेम रख -सारे 
भूखे को रोटी दे देना 
अंधियारे में दीप जला दे 
ख़ुशी किसी चेहरे दे देना 
मीठे बोल -घोल रस देना !!
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सत्कर्मों या दुष्कर्मों का 
फल है निश्चित-लेना 
गाँठ बाँध मन सोच रे भाई 
क्या बबूल से -आम है लेना !!
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अंत में नंगे कर नहलाएं 
गहने -कपडे -सभी उतारें 
गठरी-गुण-धर्मों की बांधें 
लूट कोई ना पाए !!
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यही चले है संग तुम्हारे 
धर्मराज "स्वागत" आते 
यही आत्मा आलोकित हो 
"अमर" -धरा को स्वर्ग करे !!
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल "भ्रमर"५ 
२३.०७.२०११ ७.५१ पूर्वाह्न 

4 टिप्‍पणियां:

  1. सत्कर्मों या दुष्कर्मों का
    फल है निश्चित-लेना
    गाँठ बाँध मन सोच रे भाई
    क्या बबूल से -आम है लेना !!
    सटीक लिखा है आपने ! बहुत बढ़िया लगा! बेहतरीन प्रस्तुती!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  2. सभी दोहे सार्थक सन्देश दे रहे हैं ... लाजवाब ...

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  3. प्रिय बबली जी सत्कर्मों या दुष्कर्मों का फल तो निश्चित ही यहीं मिलना ही है -रचना आप को अच्छी लगी लिखना सार्थक रहा
    आभार आप का
    भ्रमर ५

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  4. प्रिय दिगंबर जी सत्कर्मों या दुष्कर्मों का फल तो निश्चित ही यहीं मिलना ही है -दोहे सार्थक लगे -रचना आप को अच्छी लगी लिखना सार्थक रहा
    आभार आप का
    भ्रमर ५

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