MUSKURA KE TO JAAIYE

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मंगलवार, 12 जुलाई 2011

राज-कमल है पूजा जाता महल बसे दरबार लगे

राज-कमल है पूजा जाता 
महल बसे दरबार लगे 
रखवाली खुशहाली उसके 
आगे पीछे चार लगे 
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कीचड-कमल गाँव यूं रहता 



भैंसों के सींगों से डरते 
खिला -तभी भी उसके जैसा 
सरसिज-नभ में जैसे चंदा !!
खुश अवाम को रखता यूं है 
तारे जैसे हों मयंक से आँख मिलाये 
टिम-टिम टिम-टिम जलते बुझते 
अंधियारे को रहते कोसों दूर भगाए 
(photo with thanks from googal/net)
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राज -कमल से मिलने दौड़े 
गिने चुने कुछ लोग पधारें 
वो महलों अठखेली करता 
मस्त रहे -निज रूप निहारे !!
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इधर कमल मुस्काते -डोले 
पवन के संग-संग ले हिचकोले 
लहरों के संग खेले जाए 
देख उसे मेला लग जाए !!
नहीं कोई बंधन-सीमा है 
जाति -धर्म ना धन-निर्धन का 
जो भी आये ख़ुशी ख़ुशी वे 
एक दूजे को गले लगा ले !!
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पुरवा कभी तो -पछुआ डोले 
मौसम पल में अदले -बदले 
उधर महल सरसिज की शोभा 
में -नित नूतन सपने सजते 
कीचड पत्ते रास न आते 
नाल समेत वे कमल उखाड़े 
दूर फेंक- फिर -बेदर्दी ना नजर मिलाते !!
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इधर कमल आया निखर पर 
दो से पैदा चार हुए 
चार घूम -चहुँ दिशि में छाये 
मुस्काएं-सब को ललचायें 
गले मिलाएं -खुश कर जाएँ 
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"भ्रमर' कहें हे ! प्रभु कीचड से 
कमल-खिले -गुण धरती-माँ का !
धैर्य ,प्रदाता, सहनशीलता 
हरियाली -मुस्कान सभी को जाये देता !!
दे ऐसा माहौल इसे तू 
इस सरसिज सा -प्यार हमेशा !
जहाँ -पर   इसे खिलाये !!
नीर कभी भी ना कम होए !
नीरज - मन- ना  कबहूँ मुरझाये !!
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शुक्ल भ्रमर ५- ३.७.११-१० मध्याह्न 
जल पी बी