शनिवार, 30 अप्रैल 2022
नारी का श्रृंगार तो पति है
गुरुवार, 21 अप्रैल 2022
पृथ्वी दिवस
रविवार, 10 अप्रैल 2022
कन्या पूजन चैत्र नवरात्रि
शुक्रवार, 25 मार्च 2022
विरहिन
बुधवार, 23 मार्च 2022
गौरैया
शनिवार, 19 मार्च 2022
सरयू तट राम खेलें होली सरयू तट
शनिवार, 12 जून 2021
बाल श्रम निषेध
शनिवार, 15 मई 2021
कोठी अटारी पे आए कागा
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कोठी अटारी पे आए कागा
नथुनी बेसर छू छू भागे
चांद चकोर से मन जो लागा
प्राण पखेरू न उड़ मिल जाए
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर5
प्रतापगढ़ , उत्तर प्रदेश,
भारत
बुधवार, 12 मई 2021
कोरोना है डरा रहा
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कोरोना है डरा रहा,
चुन चुन करे शिकार
आंख बन्द माने नहीं ,
शामिल हुए हजार।
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कोरोना से मत डरो,
अपनाओ सब ढाल
हृष्ट पुष्ट ताकत रखो,
कर लो प्राणायाम,
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काढ़ा भाप गर्म पानी लो,
घर में करो आराम,
मास्क सैनिटाइजर ना भूलो,
बाहर गर हो काम
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अदरक तुलसी मिर्च हो काली,
लौंगा और गिलोय
नीबू सेंधा नमक प्याज भी,
घर में करो प्रयोग
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रूप प्रभु के यहां चिकित्सक
लो सलाह भरपूर
जो बोलें तुम करो दवाई
खा लो थोड़ा धूप
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कुछ कपूर हो लौंग साथ में,
कभी कभी लो सूंघ
प्रोन पोजिशन लेट सांस लो,
ऑक्सिजन भरपूर।
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प्रात उठो टहलो बस घर में
योग ध्यान कसरत कुछ कर लो,
पौधों फूलों से कुछ खेलो
प्यार करो हंस लो मुस्का लो।
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आंधी आए कुछ फल गिरते
बचते फिर मजबूत
आओ बांटें व्यथा सभी की,
हृदय बचे ना कोई शूल।
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश
भारत
रविवार, 11 अप्रैल 2021
नेह निमंत्रण दे जाते कुछ
छुआ जब से मुझको तूने
खिल गई हूं
कली से मै फूल बनकर
भ्रमर आते ढेर सारे
छुप रही हूं
ना सताएं शूल बनकर
गुनगुनाते छेड़ते कितने तराने
खुश बहुत हूं
तार की झनकार बनकर
मधु पराग खुश्बू ले उड़ते
फिर हूं रचती अन्नपूर्णा -
स्नेह घट मै कुंभ बनकर
नेह निमंत्रण दे जाते कुछ
झांक नैनों पढ़ रही हूं
संग जाती हूं कभी मुस्कान बनकर
वेदनाएं ले उदासी घूमते कुछ
धड़कनें दिल की समझती
अश्रु धारा मै सहेजूं सीप बनकर
नत हुए कुछ पाप ले मिलते शरण तो
पूत करती मै पवित्री
बह रही जग गंगा यमुना धार बनकर
स्नेह पूजा मान देते ढेर सारे
प्रकृति अपनी देवी मां हूं
बलि हुई हूं
सुख प्रदाता हवन बनकर
सुरेंद्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5,
12.04.2021
शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021
आई माई मेरी अम्मा है प्राण सी
आई माई मेरी अम्मा है प्राण सी
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रूपसी थी कभी चांद सी तू खिली
ओढ़े घूंघट में तू माथे सूरज लिए
नैन करुणा भरे ज्योति जीवन लिए
स्वर्ण आभा चमक चांदनी से सजी
गोल पृथ्वी झुलाती जहां नाथती
तेरे अधरों पे खुशियां रही नाचती
घोल मधु तू सरस बोल थी बोलती
नाचते मोर कलियां थी पर खोलती
फूल खिल जाते थे कूजते थे बिहग
माथ मेरे फिराती थी तू तेरा कर
लौट आता था सपनों से ए मां मेरी
मिलती जन्नत खुशी तेरी आंखों भरी
दौड़ आंचल तेरे जब मै छुप जाता था
क्या कहूं कितना सारा मै सुख पाता था
मोहिनी मूर्ति ममता की दिल आज भी
क्या कभी भूल सकता है संसार भी
गीत तू साज तू मेरा संगीत भी
शब्द वाणी मेरी पंख परवाज़ भी
नैन तू दृश्य तू शस्त्र भी ढाल भी
जिसने जीवन दिया पालती पोषती
नीर सी क्षीर सी अंग सारे बसी
आई माई मेरी अम्मा है प्राण सी
सुरेंद्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत , 10.4.2021
प्रिय ने शायद देख लिया
आज चांद का रंग कुछ बदला ,
' प्रिय ' ने शायद देख लिया ।
लाल तभी है मेरा मुखड़ा,
नैन उतर दिल नेह किया ।।
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर5
गुरुवार, 8 अप्रैल 2021
कर सोलह श्रृंगार नटी ये
कर सोलह श्रृंगार नटी ये
...…...……..........
नीले नभ पे श्वेत बदरिया
मलयानिल मिल रूप आंकती
हिमगिरि पे ज्यों पार्वती मां
सुंदरता की मूर्ति झांकती
……....….....
शिव हों भोले ठाढे जैसे
बादल बड़े भयावह काले
वहीं सात नन्हे शिशु खेलें
ब्रह्मा विष्णु सभी सुख ले लें
……..…............
निर्झर झरने नील स्वच्छ जल
कल कल निनादिनी सरिता देखो
हरियाली चहुं ओर है पसरी
स्वर्ण रश्मि अनुपम छवि देखो
…...................
कर सोलह श्रृंगार नटी ये
प्रकृति मोहती जन मन देखो
..…
श्वेत कबूतर ले गुलाब है
उड़ा आ रहा स्वागत कर लो
…...…........
फूल की घाटी तितली भौंरे
कलियों फूल से खेल रहे
खुशबू मादक सी सुगन्ध ले
नैन नशीले बोल रहे
......
पंछी कुल है हमें जगाता
कलरव करते दुनिया घूमे
छलक उठा अमृत घट जैसे
अमृत वर्षा हर मुख चूमे
...........
हहर हहर तरू झूम रहे हैं
लहर लहर नदिया बल खाती
गोरी सिर अमृत घट लेकर
रोज सुबह आ हमे उठाती
..........
ओस की बूंदें मोती जैसे
दर्पण बन जग हमे दिखाती
करें खेल अधरो नैनों से
बड़ी मोहिनी हमे रिझाती
............
कहीं नाचते मोर मोरनी
झंकृत स्वर हैं कीट पतंगे
रंग बिरंगी अद्भुत कृति की
शोभा निखरी किस मुंह कह दें
,.....….........
मन कहता भर अनुपम छवि उर
नैन मूंद बस कुटी रमाऊं
स्नेह सिक्त मां तेरा आंचल
शिशु बन मै दुलराता जाऊं
..........
उठो सुबह हे! ब्रह्म मुहूरत
योग ध्यान से भरो खजाना
वीणा के सुर ताल छेड़ लो
क्या जाने कब लौट के आना ।
.........
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश
भारत 8.4.2021
मंगलवार, 6 अप्रैल 2021
मुझको भी ले चल तू मुन्ना रंग बिरंगे सपनों में
नैन मूंद मत करे अकेला
मेरे जीवन का तू मेला
मुझको भी लेे चल तू मुन्ना
रंग बिरंगे सपनों में....
अंक भरूं मै चंदा मामा
सूरज चाचू को जल दे दूं
तारों संग कुछ कंचा खेलूं
नील गगन में सैर करूं
मुझको भी लेे चल तू मुन्ना......
परियों संग मै खेलूं कूदूं
सप्तऋषि संग वेद पढूं
परियों की जादुई छड़ी लेे
शक्तिमान बन खेल करूं
मुझको भी लेे चल तू मुन्ना.........
तितली बन मै फूल की घाटी
पर्वत चढ़ बादल से खेलूं
कामधेनु से मांग खिलौने
कल्पवृक्ष पे झूला झूलूं
मुझको भी लेे चल तू मुन्ना
रंग बिरंगे सपनों में....
नदियां सागर झील व झरने
हरे भरे जंगल में घूमूं
हाथी दादा हिरन मोर से
करूं दोस्ती सब सुख लेे लूं
मुझको भी लेे चल तू मुन्ना
रंग बिरंगे सपनों में....
गौरैया तोता बुलबुल संग
राजहंस बगुला संग उड़ लूं
ले प्यारे बच्चों की टोली
कान्हा संग मै माखन खाऊं
मुझको भी लेे चल तू मुन्ना
रंग बिरंगे सपनों में....
चलूं घुटुरुवन छुन्नुन छुन्नून
पैजनिया पैरन में पाऊं
उठूं गिरूं चीखूं चिल्ला के
मां की गोदी में छुप जाऊं
मुझको भी लेे चल तू मुन्ना
रंग बिरंगे सपनों में....
आंख बंद जब तू मुस्काए
तीन देव संग जग हंस जाए
अधर तुम्हारे जब रोने को
मातृ दे वियां सब दुलराएं
मुझको भी लेे चल तू मुन्ना.........
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तरप्रदेश, भारत
बुधवार, 31 मार्च 2021
पल्लव कोंपल है गोद हरी
शीत बतास औे पाला सहे नित
ठूंठ बने हिय ताना सुने जग
कूंच गई फल फूल मिले
तेरे साहस पे नतमस्तक सब
पल्लव कोंपल है गोद हरी
रस भर महुआ निर्झर झर झर
सब खीझत रीझत दुलराते
सम्मोहित कुछ वश खो जाते
मधु रस आकर्षित भ्रमर कभी
री होली फाग सुनावत हैं
छलकाए देत रस की गागर
ज्यों अमृत पान करावत है
ऋतुराज वसंत भी देख चकित
गोरी चंदा तू कर्पूर धवल
रचिता बनिता दुहिता गुण चित
चहुं लोक बखान बखानत बस
शुध चित्त मर्मज्ञ हरित वसनी
पावन करती निर्झर जननी
बल खाती सरिता कंटक पथ
उफनत हहरत सागर दिल पर
कुछ दबती सहती शोर करे
गर्जन बन मोर नचावत तो
कुछ नाथ लेे नाथ रिझावत है
मंथन कर जग कुछ सूत्र दिए
मदिरा मदहोश हैं राहु केतु
कुछ देव मनुज संसार हेतु
री अमृत घट करुणा रस की
मै हार गया वर्णन सिय पी
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सुरेंद्र कुमार शुक्ल
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत
प्रकृति रम्य नारी सृष्टि तू
बार बार उड़ने की कोशिश
गिरती और संभलती थी
कांटों की परवाह बिना वो
गुल गुलाब सी खिलती थी
सूर्य रश्मि से तेज लिए वो
चंदा सी थी दमक रही
सरिता प्यारी कलरव करते
झरने चढ़ ज्यों गिरि पे जाती
शीतल मनहर दिव्य वायु सी
बदली बन नभ में उड़ जाती
कभी सींचती प्राण ओज वो
बिजली दुर्गा भी बन जाती
करुणा नेह गेह लक्ष्मी हे
कितने अगणित रूप दिखाती
प्रकृति रम्य नारी सृष्टि तू
प्रेम मूर्ति पर बलि बलि जाती
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सुरेंद्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत

