MUSKURA KE TO JAAIYE

शुक्रवार, 4 मार्च 2016

अभिव्यक्ति की आजादी

अभिव्यक्ति की आजादी
=======================
पढ़ते हुए बच्चे का अनमना मन
टूटती ध्यान मुद्रा
बेचैनी बदहवासी
उलझन अच्छे बुरे की परिभाषा
खोखला करती खाए जा रही थी .......
कर्म ज्ञान गीता महाभारत
रामायण राम-रावण
भय डर आतंक
राम राज्य देव-दानव
धर्म ग्रन्थ मंदिर मस्जिद ..और भी बहुत कुछ ..
पी एच डी कर भी जेल जाना
गरीब अमीर परदा दीवार
आरक्षण भेदभाव मनुवाद सम्राज्य्वाद
सब मकड़जाल सा उलझा तो
बस उलझता गया…. दिमाग सुन्न.......
किताबें फेंकशोर में खो गया
गुड्डे गुड़िया के खेल में
अचानक क्रूरता हिंसा ईर्ष्या जागी
कपडे नोंच चीड़ फाड़ रौंद पाँव तले

नर- सिंह  सा हांफ गया ............................
आजादी -आजादी इस से आजादी उस-से आजादी या फांसी ?
अभिव्यक्ति की आजादी ...
कुछ लोगों की भेंड़ चाल झुण्ड देख
वह दौड़ा अंधकार में अंधे सा ....
माँ ने एक थप्पड़ जड़ा ..रुका ……
आँचल से पसीना पोंछ ..समझाया
बैठाया… प्यार से पोषित करदिखाया
देख !  चिड़िया भी अपना घर तिनके तिनके ला
बनाती  हैं घोंसला… उजाड़ती नहीं
बन्दर मत बन -….उजाड़ -आग -विनाश नहीं
जिस थाली में खाते हैं छेद नहीं करते
अपना घर परिवेश समाज देश समझ
संस्कार प्यार ईमान धर्म कर्म
तेरे खोखले पी. यच. डी. विज्ञान पर भारी हैं
भूख ..गरीबी जाति धर्म नहीं देखती
ये वाद .. वो वाद ..विवाद ही विवाद
सामंजस्य समझौता परख जाँच
जरुरी है महावीर बुद्ध ज्ञानी बनने हेतु
शून्य में विचर पानी में लाठी मत पीट
कुएं में एक भेंड़ कूदी
फिर सब सत्यानाश ...हाहाकार
जंगल राज ..अन्धकार से सहजता में
सरल बन ..शून्य बन
फिर ऊंचाइयों में चढ़ना आसान है
बच्चे ने आकाश की ऊंचाइयों में झाँका
कुछ आँका ..जाँचा
समझ गयी थी
आग लगाने से विकास नहीं होता
होता है विनाश ..नंगापन का नाच
भूख नहीं मरती
कटुता ही है बढ़ती
और हम जाते हैं ग्राफ में नीचे
पचास साल और पीछे
और फिर तिरंगा ले वह सावधान हो गया
वन्दे मातरम ..
जय हिन्द .....
उहापोह अब सुसुप्ति में चुका  था ...
=========================
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर
कुल्लू यच पी
-.५२ पूर्वाह्न
२८ फरवरी २०१६

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

नशे में त्रस्त

आदरणीया निशा जी के प्रोत्साहन पर एक अधूरी कहानी पूरी करने की कोशिश ... अपना अंगना में

रंजना नन्ही वंशिका की बातों से अचंभित रह गयी छोटी बच्ची और इतनी बड़ी बात . ..उसका मन कचोटने लगा कि क्यों वो आज तक ऐसा नहीं सोचती रही क्या कमी है उसके अंदर हर दिन हर समय घुटन , एक नारी होने का ये तो मतलब नहीं कि हर कुछ मन मसोस कर मान लिया जाए सहा जाए ! बहुत सहा उसने नित्य प्रति की घरेलू हिंसा कितना कुछ उसने राहुल को समझाया था जब नशा उतरता था वो मान भी जाता था अक्सर दिन में, तब मेरा कोमल मन पिघल जाता था पति को देवता सा समझाया गया था बचपन से वो संस्कार अब तक सब कुछ बर्दास्त करने को प्रेरित करता था , लेकिन अब रंजना ने मन में निश्चय किया पढ़ी लिखी तो थी ही बच्चों के ट्यूसन और फिर एक कोचिंग से उसने शुरुआत की वंशिका को भी उसने एक अच्छी नर्सरी में दाखिला दिल दिया राहुल को ये सब बड़ा नागवार गुजरा झड़प हुयी तो वो कुछ दिन मायके चली गयी और फिर उसने एक कमरा अलग ले कर सब संभाल लिया , नशे में त्रस्त राहुल अब अकेला हो चला था और टूटने लगा था , एक
एक दिन अब उसका भारी हो रहा था नशे के आदी को बात करने वाला नहीं मिलता तो उसे बहुत खलता है समाज की कमी सब को खलती है अकेलापन उसे खाता है और मानसिक रूप से वह और बीमार होने लगता है रंजना दूर से ही उसकी खबर लेती रहती थी . मायके वाले भी राहुल को ठीक से तवज्जो नहीं देते थे न अधिक जानकारी ..रंजना की सहेली से कई बार वो दिन में मिला और अपनी हालात बयाँ किया
उसने रंजना से मिल के उसके दिल की हालत बताने और समझौता कराने की मिन्नतें की कि अब वो एक देवी सी पत्नी को दुःख नहीं देगा और अपना नशा छोड़ देगा , रंजना की सहेली ने जब उसे सब बताया कि अब उसने नशा कम किया लेकिन मानसिक रूप से बहुत बीमार हो रहा है और वह अकेले में धैर्य खो सकता है तो रंजना फिर राहुल के प्रति नरम हो गयी लेकिन इस बार उसने उसे सुधार कर ही छोड़ने का प्रण किया अकेले रहते ही वह राहुल से मिलती रही धनात्मक रुख दिखने लगा था रंजना का प्रेम जीत गया था एक दिन नम आँखों से राहुल ने रंजना को आगोश में भर लिया और रंजना भी प्रेम से सराबोर हो गले मिल गयी फिर दोनों साथ आये और राहुल की आदत जब बिलकुल बदल गयी तो वंशिका भी अपने घर आई और ठिठोली ले कर कहा ना ना मम्मी पप्पा से कट्टी मत करना पप्पा बड़े प्यारे हैं .....राहुल ने वंशिका को दिल में भर लिया .....
भ्रमर ५

शनिवार, 14 सितंबर 2013

घुट-घुट मरती हैं बच्ची

इस रचना में एक अधिवक्ता की पत्नी का दर्द फूट पड़ा है ………………
ना जइयो तुम कोर्ट हे !
मेरे दिल को लगा के ठेस ….
जब जग जाहिर ये झूठ फरेबी
बार-बार लगते अभियोग
अंधी श्रद्धा भक्ति तुम्हारी
क्यों फंसते झूठे जप-जोग
आँखें खोलो करो फैसला
ना जाओ लड़ने तुम केस ………….
ना जइयो तुम कोर्ट हे !
मेरे दिल को लगा के ठेस ….
========================
जान बचा-ना न्याय दिला-ना
बातें प्रिय तेरी सच्ची
ये गरीब वो पैसे वाला
घुट-घुट मरती हैं बच्ची
रिश्ते-नाते मात-पिता सब
दर्द में उलझे मरते रोज
आँखें खोलो करो फैसला
ना जाओ लड़ने तुम केस ………….
ना जइयो तुम कोर्ट हे !
मेरे दिल को लगा के ठेस ….
================================
तेरे बीबी बच्चों को जब
धमकी, दिल दहलायेगी
क्या गवाह तुम बने रहोगे ?
टूट नहीं तुम जाओगे ?
न्याय की देवी को प्रियतम हे !
क्या सच्चाई कह पाओगे ?
आँखें खोलो करो फैसला
ना जाओ लड़ने तुम केस ………….
ना जइयो तुम कोर्ट हे !
मेरे दिल को लगा के ठेस ….
==============================
दस-दस झूठों में सच्चा ‘इक’
घिसता नाक रगड़ता है
तू बहुमत-बहुमत करके क्यों
सच्चाई से चिढ़ता है
पोथी पत्रा नियम नीति को
सच्ची राह पे ले आओ
चलो नहीं हे ! खेती करते
कोर्ट कचहरी मत जाओ
आँखें खोलो करो फैसला
ना जाओ लड़ने तुम केस ………….
ना जइयो तुम कोर्ट हे !
मेरे दिल को लगा के ठेस ….
==============================
आसमान से गोले गिरते
धरती सब सहती जाती
धैर्य प्रेम ममता स्नेह ही
जल-जल हरियाली लाती
अतिशय प्रलय प्रकोप का कारक
दुष्ट निशाचर बन जाते
साधु -संत क्या पापी फिर तो
काल के गाल समा जाते
==========================
आँखें खोलो करो फैसला
ना जाओ लड़ने तुम केस ………….
ना जइयो तुम कोर्ट हे !
मेरे दिल को लगा के ठेस ….
==========================
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर’५
9.20 A.M.-10.40 A.M.
कुल्लू हिमाचल
08.09.2013
Vie

गुरुवार, 14 मार्च 2013

मै आतंकी बनूँ अगर माँ खुद “फंदा” ले आएगी


प्रिय दोस्तों इस रचना को ( कोई नहीं सहारा ) ३.३.२०१3 के दैनिक जागरण अखबार में कानपुर रायबरेली (उ.प्रदेश भारत ) आदि से प्रकाशित किया गया रचना को मान और स्नेह देने के लिए आप सभी पाठकगण और जागरण जंक्शन का बहुत बहुत आभार
भ्रमर ५
हम सहिष्णु हैं भोले भाले मूंछें ताने फिरते
अच्छे भले बोल मन काले हम को लूटा करते
भाई मेरे बड़े बहुत हैं खून पसीने वाले
अत्याचार सहे हम पैदा बुझे बुझे दिल वाले
कुछ प्रकाश की खातिर जग के अपनी कुटी जलाई
चिथड़ों में थी छिपी आबरू वस्त्र लूट गए भाई
माँ रोती है फटती छाती जमीं गयी घर सारा
घर आंगन था भरा हुआ -कल- कोई नहीं सहारा
बिना जहर कुछ सांप थे घर में देखे भागे जाते
बड़े विषैले इन्ही बिलों अब सीमा पार से आते
ज्वालामुखी दहकता दिल में मारूं काटूं खाऊँ
छोड़ अहिंसा बनूँ उग्र क्या ?? आतंकी कहलाऊँ ?
गुंडागर्दी दहशत दल बल ले जो आगे बढ़ता
बड़े निठल्ले पीछे चलते फिर आतंक पसरता
ना आतंक दबे भोलों से – गुंडों से तो और बढे
कौन ‘राह’ पकडूँ मै पागल घुट घुट पल पल खून जले
बन अभिमन्यु जोश भरे रण कुछ पल ही तो कूद सकूं
धर्म युद्ध अब कहाँ रहा है ?? ‘वीर’ बहुत- ना जीत सकूं
मटमैली इस माटी का भी रंग बदलता रहा सदा
कभी ओढती चूनर धानी कभी केसरिया रंग चढ़ा
मै हिम हिमगिरि गंधक अन्दर ‘अंतर’ देखो खौल रहा
फूट पड़े जो- सागर भी तब -अंगारा बन उफन पड़ा
समय की पैनी धार वार कर सब को धूल मिला देती
कोई ‘मुकद्दर’ ना ‘जग’ जीता अंत यहीं दिखला देती
तब बच्चा था अब अधेड़ हूँ कल मै बूढा हूँगा
माँ अब भी अंगुली पकडे हे ! बुरी राह ना चुनना
कर्म धर्म आस्था पूजा ले परम -आत्मा जाने
प्रतिदिन घुट-घुट लुट-लुट भी माँ ‘अच्छाई’ को ‘अच्छा’ माने
भोला भाला मै अबोध बन टुकुर टुकुर ताका करता
खुले आसमाँ तले ‘ख़ुशी’ को शान्ति जपे ढूँढा करता
मै आतंकी बनूँ अगर ‘माँ ‘ खुद “फंदा” ले आएगी
पथरायी आँखे पत्थर दिल ले निज हाथों पहनाएगी
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर’ ५
प्रतापगढ़ उ प्र

गुरुवार, 22 नवंबर 2012

ताकतवर कुत्ते


हम लोगों की आँखों के सामने
पैदा हुए कुछ पिल्ले यहीं पले बढे
दूध मलाई खाए कार में चढ़े दुलराये
भौंकते-हमें डराते ताकतवर बन जाते हैं
dangerous-dog-pic9
( फोटो साभार गूगल नेट से लिया गया)
फिर झुग्गी बस्ती में आये पेट दिखाए
दुम हिलाए पाँव चाटे दोस्त बन जाते हैं
आगे पीछे घूम घूम सूंघ सूंघ सारी ख़बरें
बड़े कुत्तों तक पहुंचाते हराम की खाते हैं
दिलदार ‘आम’ आदमी दिल बड़ा रखता है
दिल से कहता है दिल की सुनता है
अच्छाई ईमानदारी गुण ही बुनता है
भागता है छुपता है डर डर चलता है
पिल्ले ये शेर बने गरजे बढे जाते हैं
नोच खोंच दर्द दिए खून पिए जाते हैं
दर्द हरण सुई लगा ‘आम’ लोग जीते हैं
दर्द व्यथा दिल जला सारा गम पीते हैं
ताकतवर कुत्ता दिन-दिन बौराता है
छेड़ – नोंच ‘गले’ चढ़े बड़ा गुर्राता है
दुम दबी -सीधी खड़ी आँखें दिखाता है
पागल है-पागल है शोर तब मचता है
लाठी ले पीट तब मार ‘आम’ हटता है
‘आम’ लोग-लाठी में बड़ी ही ताकत है
लम्बी उमर ‘भ्रमर’ – शिव-शैव ताकत है
करुण नैन त्रिनेत्र जभी बन जाता है
घास फूस महल लोक-स्वर्ग भी जलाता है
प्रेम दया जोश होश सत्य न्याय भारी है
घृणा झूठ अहम् कुनीति सदा ही हारी है !
———————————————-
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
८.४० पूर्वाह्न
रविवार -कुल्लू
१४.१०.2012