MUSKURA KE TO JAAIYE

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शनिवार, 14 सितंबर 2013

घुट-घुट मरती हैं बच्ची

इस रचना में एक अधिवक्ता की पत्नी का दर्द फूट पड़ा है ………………
ना जइयो तुम कोर्ट हे !
मेरे दिल को लगा के ठेस ….
जब जग जाहिर ये झूठ फरेबी
बार-बार लगते अभियोग
अंधी श्रद्धा भक्ति तुम्हारी
क्यों फंसते झूठे जप-जोग
आँखें खोलो करो फैसला
ना जाओ लड़ने तुम केस ………….
ना जइयो तुम कोर्ट हे !
मेरे दिल को लगा के ठेस ….
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जान बचा-ना न्याय दिला-ना
बातें प्रिय तेरी सच्ची
ये गरीब वो पैसे वाला
घुट-घुट मरती हैं बच्ची
रिश्ते-नाते मात-पिता सब
दर्द में उलझे मरते रोज
आँखें खोलो करो फैसला
ना जाओ लड़ने तुम केस ………….
ना जइयो तुम कोर्ट हे !
मेरे दिल को लगा के ठेस ….
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तेरे बीबी बच्चों को जब
धमकी, दिल दहलायेगी
क्या गवाह तुम बने रहोगे ?
टूट नहीं तुम जाओगे ?
न्याय की देवी को प्रियतम हे !
क्या सच्चाई कह पाओगे ?
आँखें खोलो करो फैसला
ना जाओ लड़ने तुम केस ………….
ना जइयो तुम कोर्ट हे !
मेरे दिल को लगा के ठेस ….
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दस-दस झूठों में सच्चा ‘इक’
घिसता नाक रगड़ता है
तू बहुमत-बहुमत करके क्यों
सच्चाई से चिढ़ता है
पोथी पत्रा नियम नीति को
सच्ची राह पे ले आओ
चलो नहीं हे ! खेती करते
कोर्ट कचहरी मत जाओ
आँखें खोलो करो फैसला
ना जाओ लड़ने तुम केस ………….
ना जइयो तुम कोर्ट हे !
मेरे दिल को लगा के ठेस ….
==============================
आसमान से गोले गिरते
धरती सब सहती जाती
धैर्य प्रेम ममता स्नेह ही
जल-जल हरियाली लाती
अतिशय प्रलय प्रकोप का कारक
दुष्ट निशाचर बन जाते
साधु -संत क्या पापी फिर तो
काल के गाल समा जाते
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आँखें खोलो करो फैसला
ना जाओ लड़ने तुम केस ………….
ना जइयो तुम कोर्ट हे !
मेरे दिल को लगा के ठेस ….
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर’५
9.20 A.M.-10.40 A.M.
कुल्लू हिमाचल
08.09.2013
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गुरुवार, 14 मार्च 2013

मै आतंकी बनूँ अगर माँ खुद “फंदा” ले आएगी


प्रिय दोस्तों इस रचना को ( कोई नहीं सहारा ) ३.३.२०१3 के दैनिक जागरण अखबार में कानपुर रायबरेली (उ.प्रदेश भारत ) आदि से प्रकाशित किया गया रचना को मान और स्नेह देने के लिए आप सभी पाठकगण और जागरण जंक्शन का बहुत बहुत आभार
भ्रमर ५
हम सहिष्णु हैं भोले भाले मूंछें ताने फिरते
अच्छे भले बोल मन काले हम को लूटा करते
भाई मेरे बड़े बहुत हैं खून पसीने वाले
अत्याचार सहे हम पैदा बुझे बुझे दिल वाले
कुछ प्रकाश की खातिर जग के अपनी कुटी जलाई
चिथड़ों में थी छिपी आबरू वस्त्र लूट गए भाई
माँ रोती है फटती छाती जमीं गयी घर सारा
घर आंगन था भरा हुआ -कल- कोई नहीं सहारा
बिना जहर कुछ सांप थे घर में देखे भागे जाते
बड़े विषैले इन्ही बिलों अब सीमा पार से आते
ज्वालामुखी दहकता दिल में मारूं काटूं खाऊँ
छोड़ अहिंसा बनूँ उग्र क्या ?? आतंकी कहलाऊँ ?
गुंडागर्दी दहशत दल बल ले जो आगे बढ़ता
बड़े निठल्ले पीछे चलते फिर आतंक पसरता
ना आतंक दबे भोलों से – गुंडों से तो और बढे
कौन ‘राह’ पकडूँ मै पागल घुट घुट पल पल खून जले
बन अभिमन्यु जोश भरे रण कुछ पल ही तो कूद सकूं
धर्म युद्ध अब कहाँ रहा है ?? ‘वीर’ बहुत- ना जीत सकूं
मटमैली इस माटी का भी रंग बदलता रहा सदा
कभी ओढती चूनर धानी कभी केसरिया रंग चढ़ा
मै हिम हिमगिरि गंधक अन्दर ‘अंतर’ देखो खौल रहा
फूट पड़े जो- सागर भी तब -अंगारा बन उफन पड़ा
समय की पैनी धार वार कर सब को धूल मिला देती
कोई ‘मुकद्दर’ ना ‘जग’ जीता अंत यहीं दिखला देती
तब बच्चा था अब अधेड़ हूँ कल मै बूढा हूँगा
माँ अब भी अंगुली पकडे हे ! बुरी राह ना चुनना
कर्म धर्म आस्था पूजा ले परम -आत्मा जाने
प्रतिदिन घुट-घुट लुट-लुट भी माँ ‘अच्छाई’ को ‘अच्छा’ माने
भोला भाला मै अबोध बन टुकुर टुकुर ताका करता
खुले आसमाँ तले ‘ख़ुशी’ को शान्ति जपे ढूँढा करता
मै आतंकी बनूँ अगर ‘माँ ‘ खुद “फंदा” ले आएगी
पथरायी आँखे पत्थर दिल ले निज हाथों पहनाएगी
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर’ ५
प्रतापगढ़ उ प्र

शनिवार, 3 सितंबर 2011

मै बीमार नहीं-ईमानदार हूँ

मै बीमार नहीं-ईमानदार हूँ 
कुरुक्षेत्र के मैदान सा 
खौफनाक -धंसा चेहरा 
टूटी खटिया और मडई में पड़ा 
घेरे -अधनंगे 
चमकता चेहरा चरित्रवान बच्चे
साधारण जीर्ण वस्त्र में लिपटी 
ये मेरी प्यारी गुडिया 
अर्थी उठाने नहीं जुटे 
मै बीमार नहीं ईमानदार हूँ 
ये पढ़ते हैं पास बैठ 
मेरे मन को 
मेरे दुःख को 
मेरे दर्द को 
जो मैंने झेला है 
घुट-घुट के जिया हूँ 
गरल पिया हूँ 
मेरे हाथों से छीन 
सुधा के प्याले 
जब -जब "उन्होंने "-पिया है 
चोर-चोर मौसेरे भाई 
सच ही कहा है 
मेले में अकेले 
कोने में पड़ा -पड़ा 
तिल-तिल जिया हूँ 
साठ  साल 
गाँधी की आत्मा ले 
थाना-कचहरी 
स्कूल-अस्पताल 
पग-पग पे दलाल-
से - कितना भिड़ा हूँ 
मै बीमार नहीं 
ईमानदार हूँ ----
ये देख रहे हैं 
मेरी जमा पूँजी 
मेरी धरोहर 
मेरी नजरें 
पत्थर से दिल पे 
खिले कुछ फूल 
मेरी मुस्कान 
जो अब भी 
सैकड़ों में -
फूंक देती है जान 
टटोल रहे हैं 
मेरा सोने का दिल 
और टटोलें भी क्या ??
वहां टंगा है 
एक मैला -कुचैला 
खादी का कुर्ता
सौ छेद हुयी जेब ------
मै बीमार नहीं 
ईमानदार हूँ ----
----------------------
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल "भ्रमर"५
02.09.2011 HP
00.५४ पूर्वाह्न 

रविवार, 21 अगस्त 2011

पेड़ पौधों में छाई हरियाली श्याम जू पैदा भये


आप सभी को श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर ढेर सारी हार्दिक शुभ कामनाएं आइये आवाहन करें की कृष्ण हम सब में आयें और अनाचार मिटायें हमारे सभी आन्दोलन सफल हों और दुराचारी भ्रष्टाचारी मुह की खाएं-इस कलयुग में द्वापर की बातें याद आ जाती हैं -आज तो कितनी द्रौपदी बेचारी कोई कान्हा नहीं पाती हैं ..ग्वाल बाल सब .सखियों सहेलियों का पवित्र प्यार अब कहाँ …जो भी हो आज अपने अंगना में गोपाला को आइये लायें ….गोदी में खिलाएं ….स्वागत करें …काले काले बदरा ..भादों का महीना … -भ्रमर ५
———–भ्रमर गीत———
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श्याम जू पैदा भये
आज मथुरा में -हाँ आज गोकुला में
छाई खुशियाली
श्याम जू पैदा भये
आज मथुरा में -हाँ आज गोकुला में
छाई खुशियाली
श्याम जू पैदा भये !!
ढोल मजीरा तो हर दिन बाजे
आज घर घर बजे सब की थाली
श्याम जू पैदा भये
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घुंघटा वाली नाचे चूड़ी कंगन बजाई के
बच्चे बूढ़े भी नाचें बजा ताली
श्याम जू पैदा भये
आज मथुरा में -हाँ आज गोकुला में
छाई खुशियाली
श्याम जू पैदा भये !!
बदरा बजाये पशु पक्षी भी नाचें
पेड़ पौधों में छाई हरियाली
श्याम जू पैदा भये
आज मथुरा में -हाँ आज गोकुला में
छाई खुशियाली
श्याम जू पैदा भये !!
कृष्ण पाख कुछ चाँद छिपावे
आज घर घर मने है दिवाली
श्याम जू पैदा भये
आज मथुरा में -हाँ आज गोकुला में
छाई खुशियाली
श्याम जू पैदा भये !!
भादों में नदी नाले सागर बने
कान्हा चरण छुए यमुना भयीं खाली
श्याम जू पैदा भये
आज मथुरा में -हाँ आज गोकुला में
छाई खुशियाली
श्याम जू पैदा भये !!
पूत जने माई बप्पा तो झूमें
आज देशवा ख़ुशी भागशाली
श्याम जू पैदा भये
आज मथुरा में -हाँ आज गोकुला में
छाई खुशियाली
श्याम जू पैदा भये !!
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कृपया मेरी अन्य तरह की रचनाएँ मेरे अन्य ब्लॉग पर पढ़ें जो इस पृष्ठ पर दायीं तरफ रहती हैं ….
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
२२.०८.२०११
प्रतापगढ़ उ.प्र. ६.३० पूर्वाह्न